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ये जो क़ौल-ओ-क़रार है क्या है,शक़ है या ऐतबार है क्या है ।ये जो उठता है दिल में रह रह कर,अब्र है या गुबार है क्या है ।ज़ेर-ए-लब इक झलक तबस्सुम की,बर्क़ है या शरार है क्या है ।कोई दिल का मक़ाम समझाओ,घर है या रहगुज़ार है क्या है ।ना खुला ये के सामना तेरा,दीद है इंतज़ार है क्या है ।
शाम-ए-ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़ की बातें करो,
बेख़ुदी बढ़ती चली है राज़ की बातें करो ।
ये सुकूत-ए-नाज़ ये दिल की रगों का टूटना,
ख़ामोशी में कुछ शिकस्त-ए-साज़ की बातें करो ।
कुछ क़फ़स की तीलियों से छन रहा है नूर सा,
कुछ फ़ज़ा कुछ हसरत-ए-परवाज़ की बातें करो ।
नकहत-ए-ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ दास्तान-ए-शाम-ए-ग़म,
सुबह होने तक इसी अंदाज़ की बातें करो ।
- Vinod Sehgal.
- Firaq Gorakhpuri.
जानेवाले सिपाही से पूछो वो कहाँ जा रहा है ।कौन दुखिया है जो गा रही है,भूखे बच्चों को बहला रही है,लाश जलने की बू आ रही है,ज़िन्दगी है के चिल्ला रही है,जानेवाले सिपाही से पूछो वो कहाँ जा रहा है ।कितने सहमे हुए हैं नज़ारे,कैसा ड़र-ड़र के चलते हैं तारे,क्या जवानी का खूँ हो रहा है,सुर्ख़ हैं आँचलों के किनारे,जानेवाले सिपाही से पूछो वो कहाँ जा रहा है ।घिर रहा है सियाही का डेरा,हो रहा है मेरी जाँ सवेरा,ओ वतन छोड़कर जानेवाले,खुल गया इंक़लाबी फ़रेरा,जानेवाले सिपाही से पूछो वो कहाँ जा रहा है ।- Kumar Sanu & Chorus.
- Makhdoom Moinuddin.
रात भर दीदा-ए-नमनाक में लहराते रहे,सांस की तरह से आप आते रहे जाते रहे,खुश थे हम अपनी तमन्नाओं का ख़्वाब आएगा,अपना अरमान बर-अफ़्गंदा नक़ाब आएगा,आ गई थी दिल-ए-मुज़्तर में शकेबाई सी,बज रही थी मेरे ग़मखाने में शहनाई सी,शब के जागे हुए तारों को भी नींद आने लगी,आप के आने की इक आस थी अब जाने लगी,सुबह ने सेज से उठते हुए ली अंगड़ाई,ओ सबा तू भी जो आई तो अकेले आई ।- Jagjit Singh & Asha Bhosle.
- Makhdoom Moinuddin.
इश्क़ के शोले को भड़काओ कि कुछ रात कटे,दिल के अंगारे को दहकाओ कि कुछ रात कटे ।हिज्र में मिलने शब-ए-माह के गम आये हैं,चारासाज़ों को भी बुलवाओ कि रात कटे ।चश्म-ओ-रुख़सार के अज़गार को जारी रखो,प्यार के नग़मे को दोहराओ कि कुछ रात कटे ।कोह-ए-ग़म और गराँ और गराँ और गराँ,ग़मज़दों तेश को चमकाओ कि कुछ रात कटे ।- Jagjit Singh.
- Makhdoom Moinuddin.
एक चमेली के मंड़वे तले,मैक़दे से ज़रा दूर,उस मोड़ पर ,दो बदन प्यार की आग में जल गए ।प्यार हर्फ़-ए-वफ़ा,प्यार उनका ख़ुदा,प्यार उनकी चिता,दो बदन प्यार की आग में जल गए ।हमने देखा उन्हे,दिन में और रात में,नूर-ओ-ज़ुल्मात में,दो बदन प्यार की आग में जल गए ।मस्जिदों के मुनारों ने देखा उन्हे,मंदिरों के किवाड़ों ने देखा उन्हे,मैक़दे की दरारों ने देख उन्हे,दो बदन प्यार की आग में जल गए ।अज़ अज़ल ता अबद,ये बता चाराग़र,तेरी ज़ंबील में,नुस्ख़ा-ए-कीमिया-ए-मोहब्बत भी है,कुछ इलाज-ओ-दावा-ए-उल्फ़त भी है,दो बदन प्यार की आग में जल गए ।- Jagjit Singh.
- Makhdoom Moinuddin.
हिज़ाब-ए-फ़ितना परवर अब उठा लेती तो अच्छा था,ख़ुद अपने हुस्न को परदा बना लेती तो अच्छा था ।तेरी नीची नज़र ख़ुद तेरी इस्मत की मुहाफ़िज़ है,तू इस नश्तर की तेजी आज़मा लेती तो अच्छा था ।तेरे माथे का टीका मर्द की किस्मत का तारा है,अगर तू साज़े-बेदारी उठा लेती तो अच्छा था ।तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही खूब है लेकिन,तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था ।- Jagjit Singh.
- Majaz Lucknawi.
ग़ज़ल का साज़ उठाओ बड़ी उदास है रात,नवा-ए-मीर सुनाओ बड़ी उदास है रात ।कहें न तुमसे तो फ़िर और किससे जाके कहें,सियाह ज़ुल्फ़ के सायों बड़ी उदास है रात ।सुना है पहले भी ऐसे में बुझ गए हैं चिराग़,दिलों की ख़ैर मनाओ बड़ी उदास है रात ।दिये रहो यूँ ही कुछ देर और हाथ में हाथ,अभी ना पास से जाओ बड़ी उदास है रात ।- Jagjit Singh.
- Firaq Gorakhpuri.
देखना जज़्बे मोहब्बत का असर आज की रात,
मेरे शाने पे है उस शोख़ का सर आज की रात ।
नूर ही नूर है किस सिम्त उठाऊँ आँखें,
हुस्न ही हुस्न है ता हद-ए-नज़र आज की रात ।
नगमा-ओ-मै का ये तूफ़ान-ए-तरब क्या कहना,
मेरा घर बन गया ख़ैयाम का घर आज की रात ।
नर्गिस-ए-नाज़ में वो नींद का हल्क़ा सा ख़ुमार,
वो मेरे नग़मा-ए-शीरीं का असर आज की रात ।
- Jagjit Singh.
- Majaz Lucknawi.
शहर की रात और मैं नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ,
जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूँ,
ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ,
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ।
ये रुपहली छाँव ये आकाश पर तारों का जाल,
जैसे सूफ़ी का तसव्वुर जैसे आशिक़ का ख़याल,
आह लेकिन कौन समझे कौन जाने जी का हाल,
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ।
रात हँस हँस कर ये कहती है के मैख़ाने में चल,
फिर किसी शहनाज़-ए-लालारुख़ के काशाने में चल,
ये नहीं मुमकिन तो फिर ऐ दोस्त वीराने में चल,
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ।
जी में आता है ये मुर्दा चाँद तारे नोच लूँ,
इस किनारे नोच लूँ और उस किनारे नोच लूँ,
एक दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे नोच लूँ,
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ।
रास्ते में रुक के दम ले लूँ मेरी आदत नहीं,
लौट कर वापस चला जाऊँ मेरी फ़ितरत नहीं,
और कोई हमनवा मिल जाए ये क़िस्मत नहीं,
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ।
- Jagjit Singh.
- Majaz Lucknawi.
ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्ताँ अलविदा ।अलविदा ऐ सरज़मीन-ए-सुबह-ए-खन्दाँ अलविदा,अलविदा ऐ किशवर-ए-शेर-ओ-शबिस्ताँ अलविदा,अलविदा ऐ जलवागाहे हुस्न-ए-जानाँ अलविदा,तेरे घर से एक ज़िन्दा लाश उठ जाने को है,आ गले मिल लें कि आवाज़-ए-जरस आने को है,ऐ मलीहाबाद के रंगीं गुलिस्ताँ अलविदा ।हाय क्या क्या नेमतें मुझको मिली थीं बेबहा,यह ख़ामोशी यह खुले मैदान यह ठन्डी हवा,वाए, यह जाँ बख़्श गुस्ताँ हाए रंगीं फ़िज़ा,मर के भी इनको न भूलेगा दिल-ए-दर्द आशना,मस्त कोयल जब दकन की वादियों में गाएगी,यह सुबुक छांव बगूलों की बहुत याद आएगी,ऐ मलीहाबाद के रंगीं गुलिस्ताँ अलविदा ।कल से कौन इस बाग़ को रंगीं बनाने आएगा,कौन फूलों की हंसी पर मुस्कुराने आएगा,कौन इस सब्ज़े को सोते से जगाने आएगा,कौन इन पौधों को सीने से लगाने आएगा,कौन जागेगा क़मर के नाज़ उठाने के लिये,चाँदनी रात को ज़ानों पर सुलाने के लिये,ऐ मलीहाबाद के रंगीं गुलिस्ताँ अलविदा ।आम के बाग़ों में जब बरसात होगी पुरख़रोश,मेरी फ़ुर्क़त में लहू रोएगी चश्म-ए-मैफ़रोश,रस की बूंदें जब उडा देंगी गुलिस्तानों के होश,कुन्ज-ए-रंगीं में पुकारेंगी हवायें ‘जोश जोश’,सुन के मेरा नाम मौसम ग़मज़दा हो जाएगा,एक महशर सा गुलिस्तां में बपा हो जाएगा,ऐ मलीहाबाद के रंगीं गुलिस्ताँ अलविदा ।आ गले मिल लें ख़ुदा-हाफ़िज़ गुलिस्तान-ए-वतन,ऐ अमानीगंज के मैदान ऐ जान-ए-वतन,अलविदा ऐ लालाज़ार-ओ-सुम्बुलिस्तान-ए-वतन,अस्सलाम ऐ सोह्बत-ए-रंगीं-ए-यारान-ए-वतन,हश्र तक रहने न देना तुम दकन की ख़ाक में,दफ़न करना अपने शायर को वतन की ख़ाक में,ऐ मलीहाबाद के रंगीं गुलिस्ताँ अलविदा ।- Jagjit Singh.
- Josh Malihabadi.
अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो ।मैंने माना के तुम इक पैकर-ए-रानाई हो,चमन-ए-दहर में रूह-ए-चमन आराई हो,तलत-ए-मेहर हो फ़िरदौस की बरनाई हो,बिन्त-ए-महताब हो गर्दूं से उतर आई हो,मुझसे मिलने में अब अबन्देशा-ए-रुसवाई है,मैंने खुद अपने किये की ये सज़ा पाई है ।उन दिनों मुझ पे क़यामत का जुनूँ तारी था,सर पे सरशरी-ओ-इशरत का जुनूँ तारी था,माहपारों से मोहब्बत का जुनूँ तारी था,शहरयारों से रक़ाबत का जुनूँ तारी था,बिस्तर-ए-मख़मल-ओ-संजाब थी दुनिया मेरी,एक रंगीन-ओ-हसीं ख़्वाब थी दुनिया मेरी ।क्या सुनोगी मेरी मजरूह जवानी की पुकार,मेरी फ़रियाद-ए-जिगरदोज़ मेरा नाला-ए-ज़ार,शिद्दत-ए-कर्ब में ड़ूबी हुई मेरी गुफ़्तार,मै के ख़ुद अपने मज़ाक़-ए-तरब आगीं का शिकार,वो गुदाज़-ए-दिल-ए-मरहूम कहाँ से लाऊँ,अब मैं वो जज़्बा-ए-मासूम कहाँ से लाऊँ ।- Jagjit Singh.
- Majaz Lucknawi.
अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं यूँ ही कभू लब खोले हैं,
पहले "फ़िराक़" को देखा होता अब तो बहुत कम बोले हैं ।
दिन में हम को देखने वालों अपने अपने हैं औक़ाब,
जाओ न तुम इन ख़ुश्क आँखों पर हम रातों को रो ले हैं ।
ग़म का फ़साना सुनने वालों आख़िर-ए-शब आराम करो,
कल ये कहानी फिर छेड़ेंगे हम भी ज़रा अब सो ले हैं ।
- Jagjit Singh.
- Firaq Gorakhpuri.
किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्रभर फिर भी,ये हुस्न-ओ-इश्क़ तो धोखा है सब मगर फिर भी ।हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है,नई नई सी है कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी ।तेरी निगाह से बचने में उम्र गुज़री है,उतर गया रग-ए-जाँ में ये नेशतर फिर भी ।- Jagjit Singh.
- Firaq Gorakhpuri.
तस्कीन-ए-दिल-ए-मह्ज़ूम न हुई वो सई-ए-करम फ़रमा भी गये,इस सई-ए-करम को क्या कहिये बहला भी गये तड़पा भी गये ।हम अर्ज़-ए-वफ़ा भी कर न सके कुछ कह न सके कुछ सुन न सके,यहाँ हम ने ज़बाँ ही खोले थी वहाँ आँख झुकी शरमा भी गये ।इस महफ़िल-ए-कैफ़-ओ-मस्ती में इस अन्जुमन-ए-इरफ़ानी में,सब जाम-ब-कफ़ बैठे रहे हम पी भी गये छलका भी गये ।- Jagjit Singh.
- Majaz Lucknawi.