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Dard Apna Likh Na Paaye Ungaliyan Jalti Rahi.

दर्द अपना लिख ना पाए, ऊँगलियाँ जलती रही,
रस्मो के पहरे में दिल की, चिट्ठीयाँ जलती रही ।

ज़िन्दगी की महफ़िलें सजती रही हर पल मगर,
मेरे कमरे में मेरी तन्हाईयाँ जलती रही ।

बारीशों के दिन गुज़ारे गर्मीयाँ भी कट गई,
पूछ मत हमसे के कैसे सर्दीयाँ जलती रही ।

तुम तो बादल थे हमे तुमसे बड़ी उम्मीद थी,
उड़ गये बिन बरसे तुम भी बस्तीयाँ जलती रही ।
  • Jagjit Singh.
  • Madanpal.

Har Ek Faisla Har Imtihaan Chod Diya Na Chahte Hue Bhi.

हर एक फ़ैसला हर इम्तिहान छोड़ दिया,
न चाहते हुए भी ये जहान छोड़ दिया ।

जब इसमें सांस भी लेना मुहाल होने लगा,
तो हमने जिस्म का आख़िर मकान छोड़ दिया ।

ज़मीं को घेर लिया ग़म ने तो कहाँ जाते,
ख़ुदा का शुक्र है जो आसमान छोड़ दिया ।

बनी जो भूल-भुलईया हमारी राहगुज़र,
सफ़र हयात का फिर दरमियान छोड़ दिया ।
  • Jagjit Singh.
  • Madanpal.

Gudiya Tujh Par Ik Pal Hansna Aaye Ik Pal Rona Aaye.

गुड़ीया तुझ पर इक पल हँसना, इक पल रोना आए,
वक़्त बना वो बच्चा जिसके, हाथ खिलौना आए ।

ऐसी चली हालात की आंधी बुझ गई मन की ज्योती,
अरमानो की ड़ोरी टूटी बिखर गए सब मोती,
तेरे अश्क़ों को माला में किसे पिरोना आए ।

तेरा कोई ज़ोर चले ना इस दुनिया के आगे,
तुझ पर अपना हुक़ुम चलाये रस्मो-रिवाज़ के धागे,
तेरी मजबूरी को ग़म का बोज ही ढोना आए ।

सबने शोर मचा कर कह दी अपनी अपनी बात,
बैठी रही ख़ामोश ये गुड़ीया दिल पर रख कर हाथ,
पार लगाना कोई ना जाने सबको डूबोना आए ।

काश कभी कानून की देवी आँख से पट्टी खोले,
देख के सब इंसाफ़ करे वो सच को बराबर तोले,
रस्मो के संग जज़्बो को भी उसे समोना आए ।
  • Jagjit Singh.
  • Madanpal.