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Ab Ke Barsat Ki Rut Aur Bhi Bhadkili Hai. / अब के बरसात की रूत और भी भड़कीली है,

अब के बरसात की रूत और भी भड़कीली है,
जिस्म से आग निकलती है कब़ा भी गिली है ।

सोचता हूँ कि अब अंजाम-ए-सफ़र क्या होगा,
लोग भी काँच के है राह भी पत्थरीली है ।

पहले रग-रग से मेरी ख़ून निचोड़ा उसने,
अब ये कहता है कि रंगत ही मेरी पीली है ।

मुझको बेरंग ही कर दे ना कहीं रंग इतने,
सब्ज़ मौसम है हवा सुर्ख़ फ़िज़ा गिली है ।
  • Muzaffar Warsi.
  • Chitra Singh.

Mere Dukh Ki Koi Dawa Na Karo Mujhko Mujhse Abhi Juda Na Karo. / मेरे दुख की कोई दवा ना करो, मुझको मुझसे अभी जुदा ना करो ।

मेरे दुख की कोई दवा ना करो,
मुझको मुझसे अभी जुदा ना करो ।

ना ख़ुदा को ख़ुदा कहा है तो फिर,
डूब जाओ ख़ुदा ख़ुदा ना करो ।

ये सीखाया है दोस्ती ने हमें,
दोस्त बनकर कभी दग़ा ना करो ।

इश्क़ है इश्क़ ये मज़ाक नहीं,
चंद लम्हों में फैसला ना करो ।

आशिक़ी हो के बन्दगी ‘फ़ाक़िर’,
बे-दिली से तो ये फ़िदा ना करो ।

  • Sudarshan Faakir.
  • Chitra Singh.

Ajab Apnaa Haal Hota Jo Visaal-E-Yaar Hota. / अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता,

अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता,
कभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता ।

ना मज़ा है दुश्मनी में ना है लुत्फ़ दोस्ती में,
कोई ग़ैर ग़ैर होता कोई यार यार होता ।

ये मज़ा था दिल्लगी का के बराबर आग लगती,
ना तुम्हें क़रार होता ना हमें क़रार होता ।

तेरे वादे पर सितमगर अभी और सब्र करते,
अगर अपनी ज़िन्दगी का हमें ऐतबार होता ।
  • Chitra Singh.
  • Daag Dehlvi.

Lab-E-Khamosh Se Izhaar-E-Tamanna Chahe. / लब-ए-ख़ामोश से इज़हार-ए-तमन्ना चाहे,

लब-ए-ख़ामोश से इज़हार-ए-तमन्ना चाहे,
बात करने को भी तस्वीर का लहज़ा चाहे ।

तू चले साथ तो आहट भी ना आये अपनी,
दरमियाहन भी ना हो यूँ तुझे तन्हा चाहे ।

ख़्वाब में रोये तो एहसास हो सैराबी का,
रेत पे सोये मगर आँख में दरिया चाहे ।

ऐसे तैराक़ भी देखे हैं ‘मुज़फ़्फ़र’ हमने,
गर्क़ होने के लिये भी जो सहारा चाहे ।
  • Muzaffar Warsi.
  • Chitra Singh.

Dhuan Utha Tha Deewane Ke Jalte Ghar Se Saari Raat. / धुँआ उठा था दीवाने के जलते घर से सारी रात,

धुँआ उठा था दीवाने के जलते घर से सारी रात,
लेकिन वो ख़ामोश रहे दुनिया के ड़र से सारी रात ।

रात यूँ जलते दिल पर तेरी यादों कि बरसात हुई,
जैसे इक प्यासे कि चिता पर बरख़ा बरसे सारी रात ।

सारी रात तो सपने देखे सुबह को ये महसूस हुआ,
हमने अपना सर टकराया इक पत्थर से सारी रात ।
  • Shamim Shahabadi.
  • Chitra Singh.

Kisi Ranjish Ko Hawa Do Ke Main Zinda Hoon Abhi. / किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िन्दा हूँ अभी,

किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िन्दा हूँ अभी,
मुझको एहसास दिला दो कि मैं ज़िन्दा हूँ अभी ।

मेरे रूकने से मेरी सांसें भी रूक जायेंगी,
फ़ासले और बढ़ा दो कि मैं ज़िन्दा हूँ अभी ।

ज़हर पीने की तो आदत थी ज़माने वालों,
अब कोई और दवा दो कि मैं ज़िन्दा हूँ अभी ।

चलती राहों में यूँ ही आँख लगी है ‘फ़ाक़िर’,
भीड़ लोगों की हटा दो कि मैं ज़िन्दा हूँ अभी ।
  • Sudarshan Faakir.
  • Chitra Singh.

Raat Bhi Neend Bhi Kahani Bhi Haaye Kya Cheez Hai Jawaani Bhi. / रात भी नींद भी कहानी भी, हाए ! क्या चीज़ है जवानी भी ।

रात भी नींद भी कहानी भी,
हाए ! क्या चीज़ है जवानी भी ।

दिल को शोलों से करते हैं सैराब,
ज़िन्दगी आग भी है पानी भी ।

ख़ल्क़ क्या क्या मुझे नहीं कहती,
कुछ सुनूँ मैं तेरी ज़ुबानी भी ।

पास रहना किसी का रात की रात,
मेहमानी भी मेज़बानी भी ।
  • Firaq Gorakhpuri.
  • Chitra Singh.

Ek Na Ek Shama Andhere Mein Jaalaye Rakhiye. / इक ना इक शम्मा अन्धेरे में जलाये रखिये,

इक ना इक शम्मा अन्धेरे में जलाये रखिये,
सुब्हा होने को है माहौल बनाये रखिये ।

जिन के हाथों से हमें ज़ख़्म-ए-निहाँ पहुँचे हैं,
वो भी कहते हैं के ज़ख़्मों को छुपाये रखिये ।

कौन जाने के वो किस राह-गुज़र से गुज़रे,
हर गुज़र-गाह को फूलों से सजाये रखिये ।

दामन-ए-यार की ज़ीनत ना बने हर आँसू,
अपनी पलकों के लिये कुछ तो बचाये रखिये ।
  • Taariq Badayani.
  • Chitra Singh.

Dard Badkar Fugan Na Ho Jaaye Ye Zameen Aasmaan Na Ho Jaaye. / दर्द बढ़कर फुगाँ ना हो जाये, ये ज़मीं आसमाँ ना हो जाये ।

दर्द बढ़कर फुगाँ ना हो जाये,
ये ज़मीं आसमाँ ना हो जाये ।

दिल में ड़ूबा हुआ जो नश्तर है,
मेरे दिल की ज़ुबाँ ना हो जाये ।

दिल को ले लीजिये जो लेना है,
फिर ये सौदा गराँ ना हो जाये ।

आह कीजिये मगर लतीफ़-तरीन,
लब तक आकर धुआँ ना हो जाये ।
  • Jigar Moradabadi.
  • Chitra Singh.

Dialogue & Yeh Na Thi Hamari Kismat Ke Visaal-E-Yaar Hota. - I / ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता,

पूछते हैं वो कि 'ग़ालिब' कौन है ?
कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या ?
  • Naseeruddin Shah.
नक़्श फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए-तहरीर का,
काग़ज़ी है पैरहन हर पैकर-ए-तस्वीर का ।

कावे-कावे सख़्तजानी हाय तन्हाई न पूछ...............
  • Jagjit Singh.
ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता ।

कहूँ किस से मैं के क्या है, शब-ए-ग़म बुरी बला है,
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता ।

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को,
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता ।
  • Mirza Asadullah Khan 'Ghalib'.
  • Chitra Singh.

  • Complete Ghazal.......
ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता ।

तेरे वादे पर जिये हम तो ये जान झूठ जाना,
के ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता ।

तेरी नाज़ुकी से जाना कि बँधा था अह्दबोदा,
कभी तू न तोड़ सकता अगर उस्तवार होता ।

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को,
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता ।

ये कहाँ की दोस्ती है के बने हैं दोस्त नासेह,
कोई चारासाज़ होता, कोई ग़मगुसार होता ।

रग-ए-सन्ग से टपकता वो लहू कि फिर न थमता,
जिसे ग़म समझ रहे हो ये अगर शरार होता ।

ग़म अगर्चे जाँगुसिल है, पे कहाँ बचें के दिल है,
ग़म-ए-इश्क़ गर न होता, ग़म-ए-रोज़गार होता ।

कहूँ किस से मैं के क्या है, शब-ए-ग़म बुरी बला है,
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता ।

हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्योँ न ग़र्क़-ए-दरिया,
न कभी जनाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता ।

उसे कौन देख सकता कि यगना है वो यक्ता,
जो दुई की बू भी होती तो कहीं दो चार होता ।

ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान 'ग़ालिब',
तुझे हम वली समझते, जो न बादाख़्वार होता ।



  • Complete Ghazal.......
नक़्श फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए-तहरीर का,
काग़ज़ी है पैरहन हर पैकर-ए-तस्वीर का ।

कावे-कावे सख़्तजानी हाय तन्हाई न पूछ,
सुबह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का ।

जज़्बा-ए-बेइख़्तियार-ए-शौक़ देखा चाहिये,
सीना-ए-शम्शीर से बाहर है दम शम्शीर का ।

आगही दाम-ए-शुनीदन जिस क़दर चाहे बिछाये,
मुद्दा अन्क़ा है अपने आलम-ए-तक़रीर का ।

बस के हूँ 'ग़ालिब' असीरी में भी आतिश ज़र-ए-प,
मू-ए-आतिशदीदा है हल्क़ा मेरी ज़ंजीर का ।

  • Complete Ghazal.......
ज़ौर से बाज़ आये पर बाज़ आयें क्या ?
कहते हैं हम तुम को मुँह दिखलायें क्या ?

रात-दिन गर्दिश में हैं सात आस्माँ,
हो रहेगा कुछ न कुछ घबरायें क्या ?

लाग हो तो उस को हम समझें लगाव,
जब न हो कुछ भी तो धोखा खायें क्या ?

हो लिये क्यों नामाबर के साथ-साथ,
या रब अपने ख़त को हम पहुँचायें क्या ?

मौज-ए-ख़ूँ सर से गुज़र ही क्यों न जाये,
आस्तान-ए-यार से उठ जायें क्या ?

उम्र भर देखा किये मरने की राह,
मर गए पर देखिये दिखलायें क्या ?

पूछते हैं वो कि 'ग़ालिब' कौन है,
कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या ?

Dialogue & Yeh Na Thi Hamari Kismat Ke Visaal-E-Yaar Hota. - II - Slow. / ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता,

कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने हमनशीं,
इक तीर मेरे सीने में मारा के हाये हाये ।

वो सब्ज़ा ज़ार हाये मुतर्रा के है ग़ज़ब,
वो नाज़नीं बुतान-ए-ख़ुदआरा के हाये हाये ।

सब्रआज़्मा वो उन की निगाहें के हफ़ नज़र,
ताक़तरूबा वो उन का इशारा के हाये हाये ।
  • Naseeruddin Shah.
तेरे वादे पर जिये हम तो ये जान झूठ जाना,
के ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता ।

ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता ।

ये कहाँ की दोस्ती है के बने हैं दोस्त नासेह,
कोई चारासाज़ होता, कोई ग़मगुसार होता ।

कहूँ किस से मैं के क्या है, शब-ए-ग़म बुरी बला है,
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता ।
  • Mirza Asadullah Khan 'Ghalib'.
  • Chitra Singh.

  • Complete Ghazal.......
ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता ।

तेरे वादे पर जिये हम तो ये जान झूठ जाना,
के ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता ।

तेरी नाज़ुकी से जाना कि बँधा था अह्दबोदा,
कभी तू न तोड़ सकता अगर उस्तवार होता ।

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को,
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता ।

ये कहाँ की दोस्ती है के बने हैं दोस्त नासेह,
कोई चारासाज़ होता, कोई ग़मगुसार होता ।

रग-ए-सन्ग से टपकता वो लहू कि फिर न थमता,
जिसे ग़म समझ रहे हो ये अगर शरार होता ।

ग़म अगर्चे जाँगुसिल है, पे कहाँ बचें के दिल है,
ग़म-ए-इश्क़ गर न होता, ग़म-ए-रोज़गार होता ।

कहूँ किस से मैं के क्या है, शब-ए-ग़म बुरी बला है,
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता ।

हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्योँ न ग़र्क़-ए-दरिया,
न कभी जनाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता ।

उसे कौन देख सकता कि यगना है वो यक्ता,
जो दुई की बू भी होती तो कहीं दो चार होता ।

ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान 'ग़ालिब',
तुझे हम वली समझते, जो न बादाख़्वार होता ।

  • Complete Ghazal.......
कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने हमनशीं,
इक तीर मेरे सीने में मारा के हाये हाये ।

वो सब्ज़ा ज़ार हाये मुतर्रा के है ग़ज़ब,
वो नाज़नीं बुतान-ए-ख़ुदआरा के हाये हाये ।

सब्रआज़्मा वो उन की निगाहें के हफ़ नज़र,
ताक़तरूबा वो उन का इशारा के हाये हाये ।

वो मेवा हाये ताज़ा-ए-शीरीं के वाह वाह,
वो बादा हाये नाब-ए-गवारा के हाये हाये ।

Ibtedaa ( Har Ek Baat Pe Kehte Ho Tum Ke Tu Kya Hai ? ) / इबतेदा ( हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है ? )

हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे,
कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और ।


बल्ली मारहां के मोहल्ले की, वो पेचीदा दलीलो कि सी गलियाँ, सामने टाल के नुकड्ड पे बटेरों के कसीदे, गुड़-गुड़ाती हुई पान कि पीकों में वो दाद, वो वाह वाह, चंद दरवाज़े पे लटके हुए बोसिदा से कुछ टाट के परदे, एक बकरी के मम्मीयाने की आवाज़, और धुंधलायी हुई शाम के बेनूर अंधेरे, ऐसे दीवारों से मुहँ जोड़ के चलते हैं यहाँ, चूड़ीवाला के कटरे की बड़ी भी जैसे, अपनी बुझती हुई आँखो से दरवाज़े टटोले, इसी बेनूर अंधेरी सी गली कासिम से, एक तरतीम चरागों की शुरू होती है, एक कुरान-ए-सुख़न का सफ़हा खुलता है,
असद अल्लाह ख़ाँ ग़ालिबका पता मिलता है


हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है ?
तुम्हीं कहो के ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है ?

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है ?

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन,
हमारी ज़ेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है ?

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा,
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है ?

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी,
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है ?
  • Mirza Asadullah Khan 'Ghalib'.
  • Gulzar.
  • Jagjit Singh.
  • Vinod Sehgal.
  • Chitra Singh.

  • Complete Ghazal......
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है ?
तुम्हीं कहो के ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है ?

न शोले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा,
कोई बताओ कि वो शोख़-ए-तुंदख़ू क्या है ?

ये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न हमसे,
वगर्ना ख़ौफ़-ए-बदामोज़ी-ए-अदू क्या है ?

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन,
हमारी ज़ेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है ?

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा,
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है ?

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है ?

वो चीज़ जिसके लिये हमको हो बहिश्त अज़ीज़,
सिवाए बादा-ए-गुल्फ़ाम-ए-मुश्कबू क्या है ?

पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो चार,
ये शीशा-ओ-क़दाह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू क्या है ?

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी,
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है ?

बना है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता,
वगर्ना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है ?

  • Complete Ghazal......
है बस कि हर इक उनके इशारे में निशाँ और,
करते हैं मुहब्बत तो गुज़रता है गुमाँ और ।

या रब वो न समझे हैं न समझेंगे मेरी बात,
दे और दिल उनको जो न दे मुझको ज़ुबाँ और ।

आबरू से है क्या उस निगाह -ए-नाज़ को पैबंद,
है तीर मुक़र्रर मगर उसकी है कमाँ और ।

तुम शहर में हो तो हमें क्या ग़म जब उठेंगे,
ले आयेंगे बाज़ार से जाकर दिल-ओ-जाँ और ।

हरचंद सुबुकदस्त हुए बुतशिकनी में,
हम हैं तो अभी राह में है संग-ए-गिराँ और ।

है ख़ून-ए-जिगर जोश में दिल खोल के रोता,
होते कई जो दीदा-ए-ख़ूँनाबफ़िशाँ और ।

मरता हूँ इस आवाज़ पे हरचंद सर उड़ जाये,
जल्लाद को लेकिन वो कहे जाये कि हाँ और ।

लोगों को है ख़ुर्शीद-ए-जहाँ-ताब का धोका,
हर रोज़ दिखाता हूँ मैं इक दाग़-ए-निहाँ और ।

लेता न अगर दिल तुम्हें देता कोई दम चैन,
करता जो न मरता कोई दिन आह-ओ-फ़ुग़ाँ और ।

पाते नहीं जब राह तो चढ़ जाते हैं नाले,
रुकती है मेरी तब'अ तो होती है रवाँ और ।

हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे,
कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और ।

Dil Hi To Hai Na Sang-O-Khisht Dard Se Bhar Na Aaye Kyun. / दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आये क्यूँ ?

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आये क्यूँ ?
रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यूँ ?

दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं,
बैठे हैं रहगुज़र पे हम ग़ैर हमें उठाये क्यूँ ?

क़ैद-ए-हयात-ओ-बन्द-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं,
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाये क्यूँ ?

हाँ वो नहीं ख़ुदापरस्त, जाओ वो बेवफ़ा सही,
जिसको हो दीन-ओ-दिल अज़ीज़, उसकी गली में जाये क्यूँ ?

'गा़लिब'-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बन्द हैं,
रोईए ज़ार-ज़ार क्या, कीजिए हाये-हाये क्यूँ ?
  • Mirza Asadullah Khan 'Ghalib'.
  • Jagjit Singh.
  • Chitra Singh.

  • Complete Ghazal......
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आये क्यूँ ?
रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यूँ ?

दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं,
बैठे हैं रहगुज़र पे हम ग़ैर हमें उठाये क्यूँ ?

जब वो जमाल-ए-दिलफ़रोज़, सूरत-ए-मेह्र-ए-नीमरोज़,
आप ही हो नज़ारासोज़, पर्दे में मुँह छुपाये क्यूँ ?

दश्ना-ए-ग़म्ज़ा जाँसिताँ, नावक-ए-नाज़ बेपनाह,
तेरा ही अक्स-ए-रुख़ सही, सामने तेरे आये क्यूँ ?

क़ैद-ए-हयात-ओ-बन्द-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं,
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाये क्यूँ ?

हुस्न और उस पे हुस्न-ए-ज़न रह गई बुलहवस की शर्म,
अपने पे एतिमाद है ग़ैर को आज़माये क्यूँ ?

वाँ वो ग़ुरूर-ए-इज़्ज़-ओ-नाज़ याँ ये हिजाब-ए-पास वज़अ,
राह में हम मिलें कहाँ, बज़्म में वो बुलाये क्यूँ ?

हाँ वो नहीं ख़ुदापरस्त, जाओ वो बेवफ़ा सही,
जिसको हो दीन-ओ-दिल अज़ीज़, उसकी गली में जाये क्यूँ ?

'गा़लिब'-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बन्द हैं,
रोईए ज़ार-ज़ार क्या, कीजिए हाये-हाये क्यूँ ?

Bus Ke Dushwar Hai Har Kaam Ka Aasaan Hona. / बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना,

बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्साँ होना ।

की मेरे क़त्ल के बाद उस ने जफ़ा से तौबा,
हाये उस ज़ोदपशेमाँ का पशेमाँ होना ।

हैफ़ उस चार गिरह कपड़े की क़िस्मत 'ग़ालिब',
जिस की क़िस्मत में हो आशिक़ का गरेबाँ होना ।
  • Mirza Asadullah Khan 'Ghalib'.
  • Chitra Singh.

  • Complete Ghazal......
बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्साँ होना ।

गिरिया चाहे है ख़राबी मेरे काशाने की,
दर-ओ-दीवार से टपके है बयाबाँ होना ।

वा-ए-दीवानगी-ए-शौक़ के हर दम मुझ को,
आप जाना उधर और आप ही हैराँ होना ।

जल्वा अज़बस के तक़ाज़-ए-निगह करता है,
जौहर-ए-आईन भी चाहे है मिज़ग़ाँ होना ।

इश्रत-ए-क़त्लगह-ए-अहल-ए-तमन्ना मत पूछ,
ईद-ए-नज़्ज़ारा है शमशीर का उरियाँ होना ।

ले गये ख़ाक में हम दाग़-ए-तमन्ना-ए-निशात,
तू हो और आप ब-सदरंग-ए-गुलिस्ताँ होना ।

इश्रत-ए-पारा-ए-दिल, ज़ख़्म-ए-तमन्ना ख़ाना,
लज़्ज़त-ए-रीश-ए-जिगर ग़र्क़-ए-नमक्दाँ होना ।

की मेरे क़त्ल के बाद उस ने जफ़ा से तौबा,
हाये उस ज़ोदपशेमाँ का पशेमाँ होना ।

हैफ़ उस चार गिरह कपड़े की क़िस्मत 'ग़ालिब',
जिस की क़िस्मत में हो आशिक़ का गरेबाँ होना ।

Kisi Ko De Ke Dil Koi Nawaa Sanj-E-Fugaan Kyun Ho ? / किसी को दे के दिल कोई नवासंज-ए-फ़ुग़ाँ क्यों हो ?

तुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो,
मुझ को भी पूछ्ते रहो तो क्या गुनाह हो ।
  • Neena Gupta.
किसी को दे के दिल कोई नवासंज-ए-फ़ुग़ाँ क्यों हो ?
न हो जब दिल ही सीने में तो फिर मुँह में ज़ुबाँ क्यों हो ?

वफ़ा कैसी कहाँ का इश्क़ जब सर फोड़ना ठहरा,
तो फिर ऐ संग-ए-दिल तेरा ही संग-ए-आस्ताँ क्यों हो ?

यही है आज़माना तो सताना किस को कहते हैं,
अदू के हो लिये जब तुम तो मेरा इम्तिहाँ क्यों हो ?

क़फ़स में मुझ से रूदाद-ए-चमन कहते न डर हमदम,
गिरी है जिस पे कल बिजली वो मेरा आशियाँ क्यों हो ?
  • Chitra Singh.
  • Mirza Asadullah Khan 'Ghalib'.

Ishq Mujhko Nahin Vehshat Hi Sahi Meri Vehshat Teri. / इश्क़ मुझको नहीं वहशत ही सही, मेरी वहशत तेरी

इश्क़ मुझको नहीं वहशत ही सही,
मेरी वहशत तेरी शोहरत ही सही

हम भी दुश्मन तो नहीं हैं अपने,
ग़ैर को तुझ से मोहब्बत ही सही

हम कोई तर्क़-ए-वफ़ा करते हैं,
न सही इश्क़ मुसीबत ही सही ।
  • Chitra Singh.
  • Mirza Asadullah Khan 'Ghalib'.

  • Complete Ghazal......
इश्क़ मुझको नहीं वहशत ही सही,
मेरी वहशत तेरी शोहरत ही सही ।

क़ता कीजे न त'अल्लुक़ हम से,
कुछ नहीं है तो अदावत ही सही ।

मेरे होने में है क्या रुस्वाई,
ऐ वो मजलिस नहीं ख़ल्वत ही सही ।

हम भी दुश्मन तो नहीं हैं अपने,
ग़ैर को तुझ से मोहब्बत ही सही ।

अपनी हस्ती ही से हो जो कुछ हो,
आगही गर नहीं ग़फ़लत ही सही ।

उम्र हरचंद कि है बर्क़-ए-ख़िराम,
दिल के ख़ूँ करने की फ़ुर्सत ही सही ।

हम कोई तर्क़-ए-वफ़ा करते हैं,
न सही इश्क़ मुसीबत ही सही ।

कुछ तो दे ऐ फ़लक-ए-नाइंसाफ़,
आह-ओ-फ़रियाद की रुख़सत ही सही ।

हम भी तस्लीम की ख़ू डालेंगे,
बेनियाज़ी तेरी आदत ही सही ।

यार से छेड़ा चली जाए 'असद',
गर नहीं वस्ल तो हसरत ही सही ।

Isii Chaman Mein Hamara Bhi Ik Zamana Tha. / इसी चमन में ही हमारा भी इक ज़माना था,

इसी चमन में ही हमारा भी इक ज़माना था,
यहीं कहीं कोई सादा सा आशियाना था ।

नसीब अब तो नहीं शौक़ भी नशेमन की,
लदा हुआ कभी फूलों से आशियाना था ।

तेरी क़सम अरे ओ जल्द रूठने वाले,
गुरूर-ए-इश्क़ ना था नाज़-ए-आशिक़ाना था ।

तुम्ही गुज़र गए दामन बचाके वरना यहाँ,
वही शबाब वही दिल वही ज़माना था ।
  • Chitra Singh.
  • Jigar Moradabadi.

Hum Bhi Sharabi Tum Bhi Chalke Gulabi Chalke Gulabi. / हम भी शराबी तुम भी शराबी, छलके गुलाबी छलके गुलाबी,

हम भी शराबी तुम भी शराबी,
छलके गुलाबी छलके गुलाबी,
तक़दीर दिल की ख़ाना-ख़राबी ।

जब तक है जीना खुश हो के जी लें,
जब तक है पीना जी भर के पी लें,
हसरत ना कोई रह जाए बाकी ।

कल सुबह के दामन में,
तुम होंगे ना हम होंगे,
बस रेत के सीने पर कुछ नख़्श-ए-क़दम होंगे ।

बस रात भर के मेहमान हम हैं,
ज़ुल्फ़ों में शब के थोड़े से कम हैं,
बाक़ी रहेगा सागर ना साक़ी ।
  • Chitra Singh.
  • Ali Sardar Zafri.

Zakhm Jo Aapki Innayat Hai Is Nishani Ko Naam Kya Dein Hum.

ज़ख़्म जो आपकी इनायत है, इस निशानी को नाम क्या दें हम,
प्यार दीवार बन के रह गया है, इस कहानी को नाम क्या दें हम ।

आप इल्ज़ाम धर गए हम पर, एक एहसान कर गये हम पर,
आपकी ये भी मेहरबानी है, मेहरबानी को नाम क्या दें हम ।

आपको यूँ ही ज़िन्दगी समझा, धूप को हमने चाँदनी समझा,
भूल ही भूल जिसकी आदत है, इस जवानी को नाम क्या दें हम ।

रात सपना बहार का देखा, दिन हुआ तो गुबार सा देखा,
बेवफ़ा वक़्त बेज़ुबाँ निकला, बेज़ुबानी को नाम क्या दें हम ।
  • Chitra Singh.
  • Sudarshan Faakir.

Nama Gaya Koi Na Koi, Na Koi Namabar Gaya.

नामा गया कोई ना कोई नामाबर गया,
तेरी ख़बर ना आई ज़माना गुज़र गया ।

हँसता हूँ यूँ के हिज्र की रातें गुज़र गई,
रोता हूँ यूँ के लुत्फ़-ए-दुआऐं सहर गया ।

अब मुझको है क़रार तो सब को क़रार है,
दिल क्या ठहर गया के ज़माना ठहर गया ।

या रब नहीं मैं वाक़िफ़-ए-रूदाब-ए-ज़िन्दगी,
इतना ही याद है के जीया और मर गया ।
  • Chitra Singh.
  • Seemab Akbarabadi.