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मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा,
आग से आग बुझा फूल खिला जाम उठा ।
ऐ मेरे यार तुझे उसकी कसम देता हूँ,
भूल जा शिकवा गिला हाथ मिला जाम उठा ।
एक पल भी कभी हो जाता है सदीयों जैसा,
देर क्या करना यहाँ हाथ बढ़ा जाम उठा ।
प्यार ही प्यार है सब लोग बराबर है यहाँ,
मयक़दे में कोई छोटा ना बड़ा जाम उठा ।
- Bashir Badr.
- Jagjit Singh.
ये पीने वाले बहुत ही अजीब होते हैं,
जहाँ से दूर ये ख़ुद के करीब होते हैं ।
किसी को प्यार मिले और किसी को रूसवाई,
मोहब्बतो के सफ़र भी अजीब होते हैं ।
मिला किसी को है क्या सोचीये अमीरी से,
दिलो के शाह तो अक्सर गरीब होते हैं ।
यहाँ के लोगों की है ख़ासियत ये सबसे बड़ी,
हबीब लगते हैं लेकिन रक़ीब होते हैं ।
तेरे निसार साक़ीया जितनी पीयूँ पिलाए जा,मस्त नज़र का वास्ता मस्त मुझे बनाए जा ।तुझको किसी से गर्ज़ क्या बिजली कहीं गिराए जा,दिल जले या जिगर जले तू यूँ ही मुस्कुराए जा ।सामने मेरे आ के देख रूख़ से नक़ाब हटा के देख,ख़िलमन-ए-दिल है मुंतज़िर बरक़-ए-नज़र गिराए जा ।वफ़ा-ए-बदनसीब को बख़्शा है तूने दर्द जो,है कोई इसकी भी दवा इतना ज़रा बताए जा ।- Rustam Sehgal 'Wafa'.
- Jagjit Singh.
न कह साक़ी बहार आने के दिन हैं,जिगर के दाग़ छिल जाने के दिन हैं ।अदा सी खूब अदा आने के दिन हैं,अभी तो दूर शर्माने के दिन हैं ।गरेबाँ ढूँढते हैं हाथ मेरे,चमन में फूल खिल जाने के दिन हैं ।तुम्हें राज़-ए-मोहब्बत क्या बतायें,तुम्हारे खेलने खाने के दिन हैं ।घटायें उदी उदी कह रही हैं,मय-ए-अँगूर खिचवाने के दिन हैं ।- Bekhud Dehlvi.
- Jagjit Singh.
झूम के जब रिंदों ने पिला दी,शेख़ ने चुपके चुपके दुआ दी ।एक कमी थी ताज-महल में,हमने तेरी तस्वीर लगा दी ।आपने झूठा वादा करके,आज हमारी उम्र बढ़ा दी ।तेरी गली में सजदे करके,हमने इबादत-गाह बना दी ।- Kaif Bhopali.
- Jagjit Singh.
आप आए जनाब बरसो में,हमने पी है शराब बरसो में ।फिर से दिल की कली खिली अपनी,फिर से देखा शबाब बरसो में ।तुम कहाँ थे कहाँ रहे साहिब,आज होगा हिसाब बरसो में ।पहले नादाँ थे अब हुए दाना,उनको आया अदाब बरसो में ।इसी उम्मीद पे मैं ज़िन्दा हूँ,क्या वो देंगे जवाब बरसो में ।- Rustam Sehgal 'Wafa'.
- Jagjit Singh.
मेरे क़रीब ना आओ के मैं शराबी हूँ,
मेरा शऊफ़ जगाओ के मैं शराबी हूँ ।
ज़माने भर की निगाहों से गिर चुका हूँ मैं,
नज़र से तुम ना गिराओ के मैं शराबी हूँ ।
ये अर्ज़ करता हूँ गिर के ख़ुलुस वालो से,
उठा सको तो उठाओ के मैं शराबी हूँ ।
तुम्हारी आँख से भर लूँ सुरूर आँखों में,
नज़र नज़र से मिलाओ के मैं शराबी हूँ ।
नज़र नज़र से मिलाकर शराब पीते हैं,
हम उनको पास बिठाकर शराब पीते हैं ।
इसीलिये तो अँधेरा है मयकदे में बहुत,
यहाँ घरों को जलाकर शराब पीते हैं ।
हमें तुम्हारे सिवा कुछ नज़र नहीं आता,
तुम्हें नज़र में सजाकर शराब पीते हैं ।
उन्हीं के हिस्से आती है प्यास ही अक्सर,
जो दूसरों को पिलाकर शराब पीते हैं ।
- Tasneem Faaruqi.
- Jagjit Singh.