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Chaurahe Par Luta Cheer, Pyade Se Pit Gaya Vazeer. / चौराहे पर लुटा चीर, प्यादे से पिट गया वज़ीर,

अटल बिहारी वाजपेयी :- जो कल थे वे आज नहीं हैं, जो आज हैं कल नहीं होंगे, होने ना होने का क्रम यूँ ही चलता रहेगा, हम हैं हम रहेंगे, ये भ्रम भी सदा पलता रहेगा । सत्य क्या है, होना या न होना, या दोनो ही सत्य है, जो है उसका होना सत्य है, जो नहीं है, उसका न होना सत्य है । मुझे लगता है के होना ना होना, दोना एक ही सत्य के दो अयाम हैं, शेष सब समझ के भेद, बुद्धी के व्यायाम हैं ।

चौराहे पर लुटा चीर,
प्यादे से पिट गया वज़ीर,
चलूँ आख़री चाल के बाजी,
छोड़ विरक्ति रचाऊँ मैं,
राह कौन सी जाऊँ मैं ।

सपना जन्मा और मर गया,
मधु रितु में बाग झड़ गया,
तिनके बिखरे हुए बटोरूँ,
या नव सृष्टि सजाऊँ मैं,
राह कौन सी जाऊँ मैं ।

दो दिन मिले उधार में,
घाटे के व्यापार में,
क्षण-क्षण का हिसाब जोडू मैं,
या पूंजी शेष लुटाऊँ मैं,
राह कौन सी जाऊँ मैं ।
  • Atal Bihari Vajpayee.
  • Jagjit Singh.

Door Kahin Koi Rota Hai, Tan Par Pehra Bhatak Raha Mann. / दूर कहीं कोई रोता है, तन पर पैहरा भटक रहा मन,

अटल बिहारी वाजपेयी :- इमरजेन्सी के दौरान, जब मेरी तबीयत ख़राब हुई, तब मुझे बैंगलौर के जेल से ऑल इन्ड़िया मैड़िकल इन्सटीट्यूट में लाया गया । चौथी या पांचवी मन्ज़िल पर रखा गया था । कड़ा पहरा था । लेकिन रोज़ सवेरे मेरी आँख अचानक खुल जाती थी । कारण ये था कि रोने कि आवाज़ आती थी । मैंने पता लगाने का प्रयास किया, ये आवाज़ कहाँ से आ रही है, किसकी आवाज़ है, तो मुझे बताया गया कि मैड़िकल इन्सटीट्यूट में रात में जिन मरीजों का देहांत हो जाता है, घर वालों को उनकी लाश सवेरे दी जाती है । सवेरे उन्हें ये जानकारी मिलती है कि उनका प्रियजन नहीं रहा ।
रोने कि आवाज़ मुझे विचलित कर गई । दूर से आवाज़ आती थी मगर हृदय को चीर कर चली जाती थी ।

दूर कहीं कोई रोता है,
तन पर पैहरा भटक रहा मन,
साथी है केवल सूनापन,
बिछुड़ गया क्या स्वजन किसी का,
क्रंदन सदा करूण होता है ।

जन्म दिवस पर हम इठलाते,
क्यों ना मरण त्यौहार मनाते,
अन्तिम यात्रा के अवसर पर,
आँसू का अशकुन होता है ।

अन्तर रोयें आँख ना रोयें,
धुल जायेंगे स्वपन संजाये,
छलना भरे विश्व में केवल,
सपना ही सच होता है ।

इस जीवन से मृत्यु भली है,
आतंकित जब गली गली है,
मैं भी रोता आसपास जब,
कोई कहीं नहीं होता है ।
  • Atal Bihari Vajpayee.
  • Jagjit Singh.

Ek Baras Beet Gaya, Sharad Chandni Udaas. / जुलसाता जेठ मास, शरद चाँदनी उदास,

अटल बिहारी वाजपेयी :- इमरजेन्सी लगी थी । सारा देश एक जेल-ख़ाने में बदल दिया गया था । स्वतंत्रताओं का अपहरण हुआ था । बड़ी संख्या में लोग गिरफ़्तार किये गये थे । जेलों में बंद किये गये थे । जब एक साल बीत गया, तो मैंने एक छोटी सी कविता लिखी ।

जुलसाता जेठ मास, शरद चाँदनी उदास,
सिसकी भरते सावन का, अंतरघट बीत गया,
एक बरस बीत गया, एक बरस बीत बया ।

एक बरस बीत गया, एक बरस बीत गया,
जुलसाता जेठ मास, शरद चाँदनी उदास,
सिसकी भरते सावन का, अंतरघट बीत गया,
एक बरस बीत गया.................................

सिखचों में सिमटा जग, किन्तु विकल प्राण विहग,
धरती से अम्बर तक, गुंज मुक्ती गीत गाया,
एक बरस बीत गया.................................

पथ निहारते नयन, गिनते दिन पलछिन,
लौट कभी आयेगा, मन का जो मीत गया,
एक बरस बीत गया.................................
Atal Bihari Vajpayee.
Jagjit Singh.

Jeevan Beet Chala, Kal Kal Karte Aaj. / जीवन बीत चला, कल कल करते आज,

अटल बिहारी वाजपेयी :- मैंने बहुत कम कवितायें लिखी हैं । वक़्त नहीं मिलता, लेकिन जब कभी साल-गिरह आती है, तब पिछले कुछ सालों से मैं हर साल-गिरह पर एक कविता लिखता हूँ ।

जीवन की ढलने लगी साँझ,
उमर घट गयी, ड़गर कट गयी,
जीवन की ढलने लगी साँझ,
बदलें हैं अर्थ, शब्द हुए व्यर्थ,
शांत बिना खुशिया हैं बांझ,
जीवन की ढलने लगी साँझ ।

जीवन बीत चला, जीवन बीत चला,
कल कल करते आज,
हाथ से निकले सारे,
भूत भविष्य कि चिन्ता में,
वर्तमान कि बाज़ी हारे,
पहरा कोई काम ना आया,
रसघट रीत चला,
जीवन बीत चला, जीवन बीत चला ।

हानि लाभ के पलड़ों में,
तुलता जीवन व्यापार हो गया,
मोल लगा बिकने वाले का,
बिना बिका बेकार हो गया,
मुझे हाट में छोड़ अकेला,
एक एक कर मीत चला,
जीवन बीत चला, जीवन बीत चला ।
  • Atal Bihari Vajpayee.
  • Jagjit Singh.

Kadam Milakar Chalna Hoga. / कदम मिलाकर चलना होगा ।

अटल बिहारी वाजपेयी :- इमरजेंसी के बाद लोगो ने जनता पार्टी पर अपना विश्वास प्रकट किया था । जय प्रकाश जी हमारे नेता थे । उनके नेतृत्व में हमने राज-घाट पर जाकर शपथ ली थी, कि हम मिलकर चलेंगे, मिलकर देश का भला करेंगे । लेकिन ऐसा नहीं हुआ, जनता पार्टी टूट गयी, बिखर गयी । जय प्रकाश जी ने अपनी आँखों के आगे जनता पार्टी का दुर्घटन देखा । गाँधी के कारण राज-घाट पर जय प्रकाश जी के नेतृत्व में जो शपथ ली गयी थी, उसका हमने पालन नहीं किया, इसका हमें अफ़सोस रहेगा । उसी समय मैंने ये कविता लिखीं थी जो मेरी पीड़ा को थोड़ी मात्रा में व्यक्त करती हैं ।

क्षमा करो बापू तुम हमको,
वचन भंग के हम अपराधी,
राज-घाट को किया अपावन,
मंजिल भूले यात्रा आधी,
जय प्रकाश जी रखो भरोसा,
टूटे सपनो को जोड़ेंगे,
चिता भस्म कि चिंगारी से,
अंधकार की गड़ तोड़ेंगे ।

बाधायें आती हैं आयें,
गिरे प्रलय की घोर घटायें,
पाँवो के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसे यदि ज्वालायें,
निज हाथों से हँसते हँसते,
हाथ लगाकर जलना होगा,
कदम मिलाकर चलना होगा ।

हास्य रूदन में तूफ़ानों में,
अमर असंख्यक बलिदानो में,
उद्यानो में विरानो में,
अपमानो में सम्मानो में,
उन्नत मस्तक उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा,
कदम मिलाकर चलना होगा ।

उजियारो में अंधकार में,
कल कछार में बीच धार में,
घोर घिनाने पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में दीर्घ हार में,
जीवन के शत शत आकर्षक,
अरमानों को दलना होगा,
कदम मिलाकर चलना होगा ।
  • Atal Bihari Vajpayee.
  • Jagjit Singh.

Kya Khoya Kya Paaya Jag Mein, Milte Aur Bichadte Mag Mein. / क्या खोया क्या पाया जग में, मिलते और बिछड़ते मग में,

अमिताभ बच्चन :- ज़िन्दगी के शोर, राजनीत की अपाधापी, रिश्ते नातों कि गलियों और क्या खोया क्या पाया के बाज़ारों से आगे, सोच के रास्ते पर कहीं एक ऐसा नुक्कड़ आता है, जहाँ पहुँच कर इन्सान एकाकी हो जाता है । तब, जाग उठता है ‘कवि’ । फिर शब्दों के रंगो से जीवन की अनोखी तस्वीरें बनती है । कवितायें और गीत सपनों की तरह आते हैं, और कागज़ पर हमेशा के लिये अपने घर बना लेते हैं ।
        अटल जी की ये कवितायें ऐसे ही पल ऐसे ही क्षणों में लिखी गयी हैं, जब सुनने वाले और सुनाने वाले में, तुम और मैं की दीवारें टूट जाती हैं, दुनिया की सारी धड़कने सिमट कर एक दिल में आ जाती हैं, और कवि के शब्द दुनिया के हर सम्वेदनशील इन्सान के शब्द बन जाते हैं ।

क्या खोया क्या पाया जग में,
मिलते और बिछड़ते मग में,
मुझे किसी से नहीं शिक़ायत,
यद्दपि चला गया पग पग में,
एक दृष्टि बीती पर ड़ाले,
यादों की पोटली टटोले,
अपने ही मन से कुछ बोलें ।

पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी,
जीवन एक अनंत कहानी,
पर तन की अपनी सीमायें,
यद्दपि सौ श्रद्धों की वाणी,
इतना काफ़ी है अंतिम,
दस्तक पर ख़ुद दरवाज़ा खोलें,
अपने ही मन से कुछ बोलें ।

जन्म मरण का अविरत फ़ेरा,
जीवन बंजारों का ड़ेरा,
आज यहाँ कल कहाँ कुछ है,
कौन जानता किधर सवेरा,
अंधियारा आकाश असीमीत,
प्राणों के पंखों को तोले,
अपने ही मन से कुछ बोलें ।
  • Amitabh Bachchan.
  • Jagjit Singh.