तुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो,
मुझ को भी पूछ्ते रहो तो क्या गुनाह हो ।
मुझ को भी पूछ्ते रहो तो क्या गुनाह हो ।
- Neena Gupta.
न हो जब दिल ही सीने में तो फिर मुँह में ज़ुबाँ क्यों हो ?
वफ़ा कैसी कहाँ का इश्क़ जब सर फोड़ना ठहरा,
तो फिर ऐ संग-ए-दिल तेरा ही संग-ए-आस्ताँ क्यों हो ?
यही है आज़माना तो सताना किस को कहते हैं,
अदू के हो लिये जब तुम तो मेरा इम्तिहाँ क्यों हो ?
क़फ़स में मुझ से रूदाद-ए-चमन कहते न डर हमदम,
गिरी है जिस पे कल बिजली वो मेरा आशियाँ क्यों हो ?
- Chitra Singh.
- Mirza Asadullah Khan 'Ghalib'.